अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दभरतजीने सभाको संकोचके वश देखा। रामबन्धु (भरतजी) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए] प्रेमको सँभाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 592 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।
स्रोत अभिलेख 2.297 · पुस्तक पृ. 592, 592
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
English explanation
AI draft: Seeing the assembly overcome by hesitation, Bharata, Rama’s brother, mustered great composure.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सभा | सभा को | the assembly |
| सकुच | संकोच | hesitation |
| बस | के वश में | under the sway of |
| भरत | भरत ने | Bharata |
| निहारी | देखा | observed |
| रामबंधु | राम के भाई भरत | Rama’s brother, Bharata |
| धरि | धारण करके | having mustered |
| धीरजु | धैर्य | composure |
| भारी | बहुत बड़ा | great |
2 कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।
English explanation
Recognizing the unsuitable moment, Bharata restrained his surge of love, as Agastya checked the growing Vindhya mountain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कुसमउ | अनुपयुक्त समय | an unsuitable moment |
| देखि | देखकर | seeing |
| सनेहु | प्रेम का आवेग | the surge of love |
| सँभारा | संयम में रखा | restrained |
| बढ़त | बढ़ते हुए | growing |
| बिंधि | विंध्य पर्वत को | the Vindhya mountain |
| जिमि | जैसे | just as |
| घटज | घड़े से जन्मे ऋषि अगस्त्य ने | Agastya, the pot-born sage |
| निवारा | रोक दिया | checked |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.297
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 592
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 592, 592
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।