अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीकी नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसीको कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचारशक्तिसे रहित) हो गये। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 556 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।
स्रोत अभिलेख 2.255 · पुस्तक पृ. 556, 557
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।
English explanation
Everyone respectfully heard the eminent sage’s words, imbued with sound policy, higher good, and personal welfare.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सभी ने | everyone |
| सादर | आदरपूर्वक | respectfully |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनिबर | मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ की | of the eminent sage Vashishtha |
| बानी | वाणी | words |
| नय | नीति | sound policy |
| परमारथ | परम हित | higher good |
| स्वारथ | अपने हित | personal welfare |
| सानी | से सनी हुई | imbued with |
2 उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।
English explanation
No answer came to mind; the people were bewildered. Then Bharata bowed his head and joined his hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उतरु | उत्तर | answer |
| न | नहीं | not |
| आव | सूझता | comes to mind |
| लोग | लोग | the people |
| भए | हो गए | became |
| भोरे | किंकर्तव्यविमूढ़ | bewildered |
| तब | तब | then |
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| भरत | राम के भाई भरत ने | Bharata, Rama’s brother |
| कर | हाथ | hands |
| जोरे | जोड़ लिए | joined together |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.255
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 556
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 556, 557
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।