अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
मूल पाठ
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
स्रोत अभिलेख 2.261 · पुस्तक पृ. 561, 562
भावार्थ
मूल पाठ के बादस्वप्रमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 561 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
English explanation
Not even in a dream is anyone the slightest bit at fault; my own misfortune is a fathomless ocean.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| दोसक | दोष का | of fault |
| लेसु | रंचमात्र | the slightest trace |
| न | नहीं | not |
| काहू | किसी का | anyone's |
| मोर | मेरा | my |
| अभाग | दुर्भाग्य | misfortune |
| उदधि | समुद्र | ocean |
| अवगाहू | अथाह; जिसकी थाह न मिले | unfathomably deep |
2 बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
English explanation
Without understanding that this was the ripening of my own sins, I needlessly tormented my mother with harsh words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनु | बिना | without |
| समुझें | समझे | understanding |
| निज | अपने | my own |
| अघ | पापों का | of sins |
| परिपाकू | परिपक्व फल | the ripened consequences |
| जारिउँ | मैंने जलाया; संताप दिया | I tormented |
| जायँ | व्यर्थ ही | needlessly |
| जननि | माता को | my mother |
| कहि | कहकर | by uttering |
| काकू | कठोर बातें; दोषारोपण | harsh reproaches |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.261
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 561
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 561, 562
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।