अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दये स्वर्णके कण या तारे भी सीताजीके विरहसे ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [रामवियोगमें] अयोध्याके नर-नारी विलीन (शोकके कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजीके पिता राजा जनक हैं, इस जगत्में भोग और योग दोनों ही जिनकी मु_ीमें हैं, उन जनकजीको मैं किसकी उपमा दूँ?॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 508 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।
पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।
स्रोत अभिलेख 2.199 · पुस्तक पृ. 508, 509
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।
English explanation
These golden particles have lost their beauty and brilliance through separation from Sita, just as Ayodhya’s men and women have become wasted with grief.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रीहत | शोभा से रहित | bereft of beauty |
| सीय | सीता के | from Sita |
| बिरहँ | वियोग में | in separation |
| दुतिहीना | चमक से रहित | without brilliance |
| जथा | जैसे | just as |
| अवध | अयोध्या के | of Ayodhya |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| बिलीना | दुःख से क्षीण | wasted with grief |
2 पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।
English explanation
With whom could I compare Sita’s father Janaka, for whom both worldly enjoyment and yoga are as readily available as something held in the palm?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पिता | पिता | father |
| जनक | राजा जनक, सीता के पिता | King Janaka, Sita’s father |
| देउँ | मैं दूँ | shall I give |
| पटतर | तुलना, उपमा | a comparison |
| केही | किससे | with whom |
| करतल | हथेली पर, सहज उपलब्ध | in the palm, readily accessible |
| भोगु | सांसारिक सुख | worldly enjoyment |
| जोगु | योग, आध्यात्मिक साधना | yoga, spiritual discipline |
| जग | संसार में | in the world |
| जेही | जिनके लिए | for whom |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.199
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 508
- सहायक विषय
- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 508, 509
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।