अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
मूल पाठ
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।
स्रोत अभिलेख 2.193 · पुस्तक पृ. 503, 503
भावार्थ
मूल पाठ के बादउनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्नेहको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंटका सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 503 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
English explanation
AI draft: His gracious disposition and favorable signs reveal affection; enmity and love cannot be concealed even by trying to hide them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखन | लक्षण; संकेत | signs; indications |
| सनेहु | स्नेह; प्रेम | affection; love |
| सुभायँ | स्वभाव से | by disposition |
| सुहाएँ | सुंदर; अच्छे | gracious; favorable |
| बैरु | वैर; शत्रुता | enmity |
| प्रीति | प्रेम | love |
| नहिं | नहीं | not |
| दुरइँ | छिपते हैं | remain hidden |
| दुराएँ | छिपाने पर भी | even when concealed |
2 अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।
English explanation
Saying this, Guha began assembling gifts; he called for tubers, roots, fruits, birds, and deer.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| कहि | कहकर | having said |
| भेंट | उपहार; भेंट की सामग्री | gifts; offerings |
| सँजोवन | जुटाने; व्यवस्थित करने | to assemble; arrange |
| लागे | लगे | began |
| कंद | कंद | tubers |
| मूल | जड़ें | roots |
| फल | फल | fruits |
| खग | पक्षी | birds |
| मृग | मृग; हिरन | deer |
| मागे | मँगाए | called for |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.193
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 503
- सहायक विषय
- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 503, 503
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।