अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।
मूल पाठ
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।
स्रोत अभिलेख 2.308 · पुस्तक पृ. 601, 602
भावार्थ
मूल पाठ के बादऔर ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [लाया हुआ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना। प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 602 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।
English explanation
Place the water from the pilgrimage sites wherever Atri, foremost among sages, directs you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रिषिनायकु | ऋषिश्रेष्ठ अत्रि | Atri, foremost among sages |
| जहँ | जहाँ | wherever |
| आयसु | आज्ञा | instruction |
| देहीं | दें | gives |
| राखेहु | रखना | place |
| तीरथ | तीर्थों का | from pilgrimage sites |
| जलु | जल | water |
| थल | स्थान पर | at the place |
| तेहीं | उसी | that very |
2 सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।
English explanation
Hearing Lord Rama’s words, Bharata felt joy; gladly he bowed his head at the sage’s lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| बचन | वचन | words |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| सुख | सुख | joy |
| पावा | पाया | experienced |
| मुनि | मुनि अत्रि के | of the sage Atri |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल समान | lotus-like |
| मुदित | प्रसन्न होकर | gladly |
| सिरु | सिर | head |
| नावा | झुकाया | bowed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.308
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 602
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 601, 602
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