अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दराग, रोष, ईष्र्या, मद और मोह—इनके वश स्वप्रमें भी मत होना। सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 405 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।
स्रोत अभिलेख 2.75 · पुस्तक पृ. 405, 406
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
English explanation
Do not fall under the sway of attachment, anger, envy, pride, or delusion, even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राग | आसक्ति | attachment |
| रोषु | क्रोध | anger |
| इरिषा | ईर्ष्या | envy |
| मदु | अभिमान | pride |
| मोहू | मोह | delusion |
| जनि | मत | do not |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| इन्ह | इनके | these |
| के | के | of |
| बस | वश में | under the sway |
| होहू | होना | become |
2 सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।
English explanation
Abandon every kind of inner fault and serve through thought, deed, and speech.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | सभी | all |
| प्रकार | प्रकार के | kinds of |
| बिकार | विकार | inner faults |
| बिहाई | त्यागकर | having abandoned |
| मन | मन से | through thought |
| क्रम | कर्म से | through deed |
| बचन | वाणी से | through speech |
| करेहु | करना | perform |
| सेवकाई | सेवा | service |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.75
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 405
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 405, 406
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।