अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
मूल पाठ
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.64 · पुस्तक पृ. 396, 397
भावार्थ
मूल पाठ के बादपरन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगत्में कोई दु:ख नहीं है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 397 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
English explanation
Yet, reflecting within my heart, I have found that no sorrow in the world equals separation from my beloved husband.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैंने | I |
| पुनि | पर, फिर अपने पक्ष से | yet, for my part |
| समुझि | विचार करके | having reflected |
| दीखि | देखा, पाया | have seen, found |
| मन | मन | heart |
| माहीं | के भीतर | within |
| पिय | प्रिय पति | beloved husband |
| बियोग | वियोग, बिछोह | separation |
| सम | के समान | equal to |
| दुखु | दुःख | sorrow |
| जग | संसार में | in the world |
| नाहीं | नहीं है | there is none |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.64
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 397
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 396, 397
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।