अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दफिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन (जानकी)को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 392 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।
स्रोत अभिलेख 2.59 · पुस्तक पृ. 392, 393
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
English explanation
I too received a beloved daughter-in-law, a treasure of beauty, lovely in virtue and character.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैंने; मुझे | I; to me |
| पुनि | भी; फिर | also; in turn |
| पुत्रबधू | पुत्र की पत्नी; सीता | daughter-in-law; Sita |
| प्रिय | प्यारी | beloved |
| पाई | प्राप्त की | received |
| रूप | सौंदर्य | beauty |
| रासि | राशि; भंडार | treasure; abundance |
| गुन | सद्गुण | virtues |
| सील | सदाचरण; अच्छा स्वभाव | good character; gentle disposition |
| सुहाई | सुशोभित; मनोहर | lovely; adorned |
2 नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।
English explanation
I cherished her as the pupil of my eye, deepening my affection, and kept my very life bound to Janaki.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नयन | आँख की | of the eye |
| पुतरि | पुतली | pupil |
| करि | मानकर; बनाकर | regarding as; making |
| प्रीति | प्रेम | affection |
| बढ़ाई | बढ़ाया | increased |
| राखेउँ | मैंने रखे | I kept |
| प्रान | प्राण; जीवन | life; vital breath |
| जानिकिहिं | जानकी में; सीता से | in Janaki; to Sita |
| लाई | लगाकर | having attached |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.59
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 392
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 392, 393
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।