अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।
मूल पाठ
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।
स्रोत अभिलेख 2.201 · पुस्तक पृ. 510, 510
भावार्थ
मूल पाठ के बादमुझ पापोंके समुद्र और अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 510 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।
English explanation
Shame, shame on me, an ocean of sin and ill-fated, for whose sake all this calamity occurred.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं; मुझ भरत को | I; me, Bharata |
| धिग | धिक्कार है | shame |
| धिग | फिर धिक्कार है | shame again |
| अघ | पापों का | of sins |
| उदधि | समुद्र | ocean |
| अभागी | अभागा | ill-fated |
| सबु | सारा | all |
| उतपातु | अनर्थ | calamity |
| भयउ | हुआ | occurred |
| जेहि | जिसके; मेरे | for whom; for me |
| लागी | कारण; लिए | because of; for the sake of |
2 कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।
English explanation
The Creator made me a disgrace to my lineage, and my wicked mother made me a betrayer of my lord.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कुल | वंश का | of the lineage |
| कलंकु | कलंक | disgrace |
| करि | बनाकर | making into |
| सृजेउ | रचा; जन्म दिया | created; brought into being |
| बिधाताँ | विधाता ने | the Creator |
| साइँदोह | स्वामी का द्रोही | a betrayer of one’s lord |
| मोहि | मुझे | me |
| कीन्ह | बना दिया | made |
| कुमाताँ | बुरी माता कैकेयी ने | my wicked mother Kaikeyi |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.201
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 510
- सहायक विषय
- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 510, 510
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।