अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दअपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस (अप्रसन्नता) नहीं देखी॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 560 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
स्रोत अभिलेख 2.26 · पुस्तक पृ. 560, 561
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
English explanation
I know my lord’s nature: he never feels anger even toward an offender.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं | I |
| जानउँ | जानता हूँ | know |
| निज | अपने | my own |
| नाथ | स्वामी राम का | of my lord Rama |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
| अपराधिहु | अपराधी भी | even an offender |
| पर | पर | toward |
| कोह | क्रोध | anger |
| न | नहीं | not |
| काऊ | कभी; किसी प्रकार का | ever; any |
2 मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
English explanation
His grace and affection toward me are special; even while playing, I have never seen him show irritation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मो | मुझ | me |
| पर | पर | toward |
| कृपा | कृपा | grace; kindness |
| सनेह | स्नेह | affection |
| बिसेषी | विशेष | special |
| खेलत | खेलते समय | while playing |
| खुनिस | खीझ; नाराज़गी | irritation; displeasure |
| न | नहीं | not |
| कबहूँ | कभी | ever |
| देखी | देखी | have seen |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.26
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 560
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 560, 561
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।