अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
मूल पाठ
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।
स्रोत अभिलेख 2.242 · पुस्तक पृ. 545, 545
भावार्थ
मूल पाठ के बादतब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंगके साथ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले। फिर उन्होंने निषादराजको हृदयसे लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [उपस्थित] मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 545 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
English explanation
AI-draft meaning: Lakshmana eagerly embraced his younger brother, then clasped the Nishada chief to his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भेंटेउ | मिले; गले मिले | met; embraced |
| लखन | लक्ष्मण, राम के छोटे भाई | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| ललकि | उत्सुक प्रेम से | with eager affection |
| लघु | छोटे | younger |
| भाई | भाई, यहाँ शत्रुघ्न | brother, here Shatrughna |
| बहुरि | फिर | then |
| निषादु | निषादराज गुह को | the Nishada chief Guha |
| लीन्ह | ले लिया | took; clasped |
| उर | हृदय से | to the heart |
| लाई | लगाकर | drawing close |
2 पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।
English explanation
Then both brothers bowed to the sages and rejoiced on receiving the blessings they desired.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| मुनिगन | मुनियों के समूह को | the assembled sages |
| दुहुँ | दोनों | both |
| भाइन्ह | भाइयों ने, भरत और शत्रुघ्न ने | brothers, Bharata and Shatrughna |
| बंदे | वंदना की | bowed to |
| अभिमत | मनचाहा | desired |
| आसिष | आशीर्वाद | blessings |
| पाइ | पाकर | having received |
| अनंदे | आनंदित हुए | rejoiced |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.242
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 545
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 545, 545
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।