अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
मूल पाठ
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.275 · पुस्तक पृ. 572, 573
भावार्थ
मूल पाठ के बादभाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे (जनकजीकी अगवानीमें) चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया)॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 572 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
English explanation
AI-generated interpretive draft: Rama went forward with his brothers, ministers, preceptor, and the townspeople.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भाइ | भाई | brothers |
| सचिव | मंत्री | ministers |
| गुर | गुरु | preceptor |
| पुरजन | नगरवासी | townspeople |
| साथा | साथ में | in company |
| आगें | आगे | forward |
| गवनु | प्रस्थान; चलना | going; departure |
| कीन्ह | किया | undertook |
| रघुनाथा | रघुकुल के स्वामी श्रीराम | Rama, lord of the Raghu lineage |
2 गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
English explanation
As soon as King Janaka saw the noble mountain, he bowed to it and left his chariot.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गिरिबरु | श्रेष्ठ पर्वत, चित्रकूट | the noble mountain, Chitrakuta |
| दीख | देखा | saw |
| जनकपति | राजा जनक | King Janaka |
| जबहीं | ज्यों ही | as soon as |
| करि | करके | having made |
| प्रनाम | प्रणाम | obeisance |
| रथ | रथ | chariot |
| त्यागेउ | छोड़ दिया; उतर गए | left; dismounted from |
| तबहीं | उसी समय | at that very moment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.275
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 572
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 572, 573
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।