अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दनिरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं;॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 450 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
स्रोत अभिलेख 2.128 · पुस्तक पृ. 450, 451
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
English explanation
The stories continually fill their ears, yet they never become full; those people’s hearts are lovely homes for you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरहिं | भरती रहती हैं | keep filling |
| निरंतर | लगातार | continually |
| होहिं | होते हैं | become |
| न | नहीं | not |
| पूरे | पूरी तरह भरे | full |
| तिन्ह | उन लोगों | those people |
| के | के | of |
| हिय | हृदय | hearts |
| तुम्ह | आप | you |
| कहुँ | के लिए | for |
| गृह | घर | homes |
| रूरे | सुंदर | lovely |
2 लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
English explanation
Those who have made their eyes like chataka birds remain longing for the rain cloud of your presence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोचन | नेत्रों को | their eyes |
| चातक | चातक पक्षी जैसा | like chataka birds |
| जिन्ह | जिन्होंने | those who |
| करि | बनाकर | having made |
| राखे | रखा है | have kept |
| रहहिं | रहते हैं | remain |
| दरस | आपके दर्शनरूपी | of the sight of you |
| जलधर | मेघ की | as a rain cloud |
| अभिलाषे | अभिलाषा में | in longing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.128
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 450
- सहायक विषय
- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 450, 451
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।