अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
मूल पाठ
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.325 · पुस्तक पृ. 615, 616
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरोंकी तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 616 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
English explanation
In describing Bharata’s way of life, understanding, deeds, and the pure splendor of his devotion, detachment, and virtues—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत की | Bharata’s |
| रहनि | रहन-सहन; आचरण | way of life; conduct |
| समुझनि | समझ; विवेक | understanding; discernment |
| करतूती | करनी; कार्य | deeds |
| भगति | भक्ति | devotion |
| बिरति | वैराग्य | detachment |
| गुन | सद्गुण | virtues |
| बिमल | निर्मल | pure |
| बिभूती | वैभव; महिमा | splendor; excellence |
2 बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।
English explanation
All shrink back in hesitation when describing these qualities; even the speech of Shesha, Ganesha, and Saraswati cannot reach their full extent.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरनत | वर्णन करते हुए | while describing |
| सकल | सभी | all |
| सुकचि | संकोच करके | with hesitation |
| सकुचाहीं | संकोच करते हैं | shrink back in hesitation |
| सेस | शेषनाग | Shesha, the divine serpent |
| गनेस | देवता गणेश | the god Ganesha |
| गिरा | वाणी की देवी सरस्वती | Saraswati, goddess of speech |
| गमु | पहुँच | reach; scope |
| नाहीं | नहीं है | does not extend |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.325
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 616
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 615, 616
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।