अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दविश्वास ही [उस आकाशमें ] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [का ध्यान] पूॢणमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति (स्मृति) आकाशगङ्गा-सरीखी प्रकाशित है। रामप्रेम ही अचल (सदा रहनेवाला) और कलङ्करहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 616 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।
स्रोत अभिलेख 2.325 · पुस्तक पृ. 615, 616
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
English explanation
His faith is the Pole Star, the appointed time of Rama’s return is like the full-moon night, and remembrance of his lord is the radiant Milky Way.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ध्रुव | ध्रुवतारा | the Pole Star |
| बिस्वास | विश्वास | faith |
| अवधि | राम के लौटने की निर्धारित अवधि | the appointed time of Rama’s return |
| राका | पूर्णिमा की रात | full-moon night |
| सी | जैसी | like |
| स्वामि | स्वामी राम की | of his lord Rama |
| सुरति | स्मृति | remembrance |
| सुरबीथि | आकाशगंगा | the Milky Way |
| बिकासी | खिली; प्रकाशित | radiant; unfolded |
2 राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।
English explanation
Love for Rama is an unwavering, spotless moon, shining perpetually clear amid this entire company.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम के प्रति | for Rama |
| पेम | प्रेम | love |
| बिधु | चंद्रमा | moon |
| अचल | अचल; अडिग | unwavering |
| अदोषा | दोषरहित; निष्कलंक | flawless; spotless |
| सहित | साथ | together with |
| समाज | इन सबका समूह | this whole company |
| सोह | शोभित होता है | shines beautifully |
| नित | सदा | always |
| चोखा | निर्मल; उज्ज्वल | clear; bright |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.325
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 616
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 615, 616
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।