अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
मूल पाठ
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
स्रोत अभिलेख 2.288 · पुस्तक पृ. 584, 585
भावार्थ
मूल पाठ के बादसब किसीको भरतजीके चरित्र, कीॢत, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझनेमें और सुननेमें सुख देनेवाले हैं और पवित्रतामें गङ्गाजीका तथा स्वाद (मधुरता) में अमृतका भी तिरस्कार करनेवाले हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 585 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
English explanation
Bharata’s character, renown, deeds, righteousness, noble disposition, and pure wealth of virtues—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| चरित | चरित्र | character |
| कीरति | यश | renown |
| करतूती | कार्य; करनी | deeds |
| धरम | धर्मनिष्ठा | righteousness |
| सील | सदाचारी स्वभाव | noble disposition |
| गुन | गुण | virtues |
| बिमल | निर्मल | pure |
| बिभूती | संपदा; ऐश्वर्य | wealth; splendor |
2 समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
English explanation
Understanding and hearing these brings joy to everyone; they are pure as the Ganges and surpass even nectar in sweetness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समुझत | समझने पर | on understanding |
| सुनत | सुनने पर | on hearing |
| सुखद | सुख देने वाले | joy-giving |
| सब | सब | all |
| काहू | किसी को; प्रत्येक को | to everyone |
| सुचि | पवित्र | pure |
| सुरसरि | गंगा के समान | like the Ganges |
| रुचि | मधुरता में | in sweetness |
| निदर | मात देने वाले | surpassing |
| सुधाहू | अमृत को भी | even nectar |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.288
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 585
- सहायक विषय
- जनक-सुनयना-संवाद, भरतजीकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 584, 585
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।