अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।
मूल पाठ
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।
स्रोत अभिलेख 2.307 · पुस्तक पृ. 601, 601
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीको परम सन्तोष हुआ। स्वामीके सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दु:ख और दोषोंने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मनका विषाद मिट गया। मानो गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गयी हो॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 601 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।
English explanation
Bharata felt supreme contentment: his lord Rama was favorably disposed, while sorrow and faults receded.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरतहि | भरत को | to Bharata |
| भयउ | हुआ | arose |
| परम | परम | supreme |
| संतोषू | संतोष | contentment |
| सनमुख | अनुकूल | favorably disposed |
| स्वामि | स्वामी राम | his lord Rama |
| बिमुख | दूर, प्रतिकूल दिशा में | turned away, receding |
| दुख | दुःख | sorrow |
| दोषू | दोष | faults |
2 मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।
English explanation
Bharata’s face brightened and his sorrow vanished, as though a mute person had received the gift of speech.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुख | मुख | face |
| प्रसन्न | प्रसन्न | bright with joy |
| मन | मन का | of the mind |
| मिटा | मिट गया | vanished |
| बिषादू | विषाद | sorrow |
| भा | हुआ, प्राप्त हुआ | came, was received |
| जनु | मानो | as though |
| गूँगेहि | गूँगे व्यक्ति को | to a mute person |
| गिरा | वाणी का | of speech |
| प्रसादू | वरदान | gift |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.307
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 601
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 601, 601
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।