अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दभय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है। क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है। मानो नदी और समुद्रके सङ्गमका जल क्षुब्ध हो रहा हो। (जैसे नदी और समुद्रके सङ्गमका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी)॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 597 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।
स्रोत अभिलेख 2.302 · पुस्तक पृ. 596, 597
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।
English explanation
Under the sway of fear and unrest, their minds were unsteady. One moment the forest appealed to them; the next, their homes seemed pleasing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भय | डर | fear |
| उचाट | व्याकुलता | unrest |
| बस | के वश में | under the sway of |
| मन | मन | the mind |
| थिर | स्थिर | steady |
| नाहीं | नहीं था | was not |
| छन | एक क्षण | one moment |
| बन | वन में | in the forest |
| रुचि | रुचि होती | felt interest; found appeal |
| छन | दूसरे क्षण | the next moment |
| सदन | घर | homes |
| सोहाहीं | सुहाते; अच्छे लगते | seemed pleasing |
2 दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।
English explanation
The people suffered from a state of mind pulled in two directions, like water at the meeting of a river and the sea.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दुबिध | दुविधापूर्ण; दो ओर खिंचती | divided; pulled two ways |
| मनोगति | मन की दशा से | in their state of mind |
| प्रजा | प्रजा; लोग | the people; subjects |
| दुखारी | दुखी | distressed |
| सरित | नदी | river |
| सिंधु | समुद्र | sea |
| संगम | के मिलन-स्थल पर | at the confluence |
| जनु | मानो | as though |
| बारी | जल | water |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.302
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 597
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 596, 597
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।