अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दआज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें क्षोभ हुआ है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 355 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
स्रोत अभिलेख 2.14 · पुस्तक पृ. 354, 355
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
English explanation
Providence has become exceedingly favorable to Kausalya; to all appearances, her pride cannot be contained in her heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भयउ | हो गया है | has become |
| कौसिलहि | कौसल्या के लिए | toward Kausalya, Rama’s mother |
| बिधि | विधाता; भाग्य | Providence; fate |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| दाहिन | अनुकूल | favorable |
| देखत | देखने पर | as one observes |
| गरब | गर्व | pride |
| रहत | समाता; रहता | remains contained |
| उर | हृदय में | in the heart |
| नाहिन | नहीं | not |
2 देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
English explanation
Why do you not go and see all that splendor, the sight of which has disturbed my heart?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखेहु | आप देखें | you should see |
| कस | क्यों | why |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जाकर | going there |
| सब | सारी | all |
| सोभा | शोभा; सजावट | splendor; festive display |
| जो | जिसे | which |
| अवलोकि | देखकर | having seen |
| मोर | मेरा | my |
| मनु | मन | heart; mind |
| छोभा | क्षुब्ध हो गया | became distressed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.14
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 355
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 354, 355
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।