अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दतब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले— हे भाई! कोई किसीको सुख-दु:खका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 419 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
स्रोत अभिलेख 2.92 · पुस्तक पृ. 419, 420
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
English explanation
Lakshmana spoke sweet, gentle words steeped in the essence of knowledge, dispassion, and devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोले | बोले | spoke |
| लखन | लक्ष्मण, राम के छोटे भाई | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| मधुर | मधुर | sweet |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बानी | वाणी | words |
| ग्यान | ज्ञान | spiritual knowledge |
| बिराग | वैराग्य | dispassion |
| भगति | भक्ति | devotion |
| रस | रस में | in the essence |
| सानी | सनी हुई | steeped |
2 काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
English explanation
Brother, no one bestows happiness or suffering on another; everyone experiences the fruits of their own actions.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| काहु | किसी को | to anyone |
| न | नहीं | not |
| कोउ | कोई | anyone |
| सुख | सुख | happiness |
| दुख | दुख | suffering |
| कर | का | of |
| दाता | देने वाला | giver |
| निज | अपने | one’s own |
| कृत | किए हुए | performed |
| करम | कर्मों का फल | the fruits of actions |
| भोग | भोगते हैं | experience |
| सबु | सब | everyone |
| भ्राता | हे भाई | O brother |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.92
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 419
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 419, 420
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।