अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दयह करुणाकी नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गें हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 573 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
स्रोत अभिलेख 2.276 · पुस्तक पृ. 573, 574
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
English explanation
This river of grief submerges the banks of wisdom and dispassion; sorrowful words join it like rivers and streams.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोरति | डुबो रही है | is submerging |
| ग्यान | ज्ञान रूपी | wisdom, figured as |
| बिराग | वैराग्य रूपी | dispassion, figured as |
| करारे | नदी के किनारे | riverbanks |
| बचन | वचन | words |
| ससोक | शोक से भरे | filled with sorrow |
| मिलत | मिल रहे हैं | are joining |
| नद | नदियाँ | rivers |
| नारे | नाले | streams |
2 सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
English explanation
The wind of anxious thoughts and sighs raises waves that break the fine trees of fortitude along the bank.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोच | चिंता | anxious thoughts |
| उसास | उच्छ्वास; आहें | sighs |
| समीर | हवा रूपी | as wind |
| तंरगा | तरंगें | waves |
| धीरज | धैर्य रूपी | fortitude, figured as |
| तट | किनारे पर | on the bank |
| तरुबर | श्रेष्ठ वृक्ष | fine trees |
| कर | करती हैं | cause |
| भंगा | टूटना; विनाश | breaking; destruction |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.276
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 573
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 573, 574
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।