अयोध्याकाण्ड · दोहा 275 · दोहा/सोरठा
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.275 · पुस्तक पृ. 572, 573
भावार्थ और शब्दार्थ
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1आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
आश्रम मानो समुद्र था, जो शांत रस रूपी पवित्र जल से भरा था।
English explanation
The hermitage was an ocean filled with the pure waters of serene feeling.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आश्रम | आश्रम | hermitage |
| सागर | समुद्र | ocean |
| सांत | शांत | serene |
| रस | भावरस | aesthetic feeling |
| पूरन | भरा हुआ | filled |
| पावन | पवित्र | pure; sanctifying |
| पाथु | जल | water |
2 सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
जनक की सेना मानो करुणा की नदी थी, जिसे श्रीराम उस आश्रम रूपी समुद्र की ओर लिए जा रहे थे।
English explanation
Janaka's host was like a river of sorrowful compassion, which Rama was leading toward that ocean-like hermitage.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेन | सेना; साथ आया विशाल दल | the army; accompanying host |
| मनहुँ | मानो | as though |
| करुना | करुणा; करुण भाव | sorrowful compassion; pathos |
| सरित | नदी | river |
| लिएँ | साथ लिए हुए | taking along |
| जाहिं | जा रहे हैं | are proceeding |
| रघुनाथु | रघुकुल के स्वामी श्रीराम | Rama, lord of the Raghu lineage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 275
- स्रोत अभिलेख
- 2.275
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 572, 573
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