अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
मूल पाठ
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
स्रोत अभिलेख 2.173 · पुस्तक पृ. 487, 487
भावार्थ
मूल पाठ के बादवानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 487 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
English explanation
AI draft: That forest-dwelling ascetic deserves lament who abandons austerity and delights in sensual pleasures.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बैखानस | वानप्रस्थ आश्रम का तपस्वी | forest-dwelling ascetic |
| सोइ | वही | that very person |
| सोचै | शोक करने के | of being lamented |
| जोगु | योग्य | worthy |
| तपु | तपस्या | austerity |
| बिहाइ | छोड़कर | having abandoned |
| जेहि | जिसे | to whom |
| भावइ | अच्छे लगते हैं | are pleasing |
| भोगू | इंद्रिय-सुख | sensual pleasures |
2 सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
English explanation
One should lament the slanderer, the person angry without cause, and the one hostile to mother, father, teacher, and kin.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोचिअ | शोक करना चाहिए | should be lamented |
| पिसुन | चुगलखोर | slanderer |
| अकारन | बिना कारण | without cause |
| क्रोधी | क्रोध करने वाला | one prone to anger |
| जननि | माता | mother |
| जनक | पिता | father |
| गुर | गुरु | teacher |
| बंधु | बंधुजन | kin |
| बिरोधी | विरोध करने वाला | one hostile to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.173
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 487
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 487, 487
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।