अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दसुमन्त्रजीके मुखका रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो इन्होंने माता-पिताको मार डाला हो। उनके मनमें रामवियोगरूपी हानिकी महान् ग्लानि (पीड़ा) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरकको जाता हुआ रास्तेमें सोच कर रहा हो॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 464 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।
स्रोत अभिलेख 2.145 · पुस्तक पृ. 464, 465
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
English explanation
He became so pale that one could not bear to look at him, as though he had killed his own father and mother.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबरन | विवर्ण, पीले पड़े | pale, drained of color |
| भयउ | हो गए | became |
| न | नहीं | not |
| जाइ | संभव होता | is possible |
| निहारी | देखना | to look at |
| मारेसि | उन्होंने मार डाला हो | he had killed |
| मनहुँ | मानो | as though |
| पिता | पिता को | his father |
| महतारी | माता को | his mother |
2 हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।
English explanation
Grief over loss and profound remorse overwhelmed his mind, like a sinner dreading the road to Yama’s realm.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हानि | हानि का दुःख | grief over loss |
| गलानि | ग्लानि | remorse |
| बिपुल | बहुत अधिक | profound |
| मन | मन में | in the mind |
| ब्यापी | छा गई | spread throughout |
| जमपुर | यमलोक का | to Yama’s realm of the dead |
| पंथ | मार्ग | road |
| सोच | चिंता | anxious dread |
| जिमि | जैसे | as |
| पापी | पाप करने वाला | a sinner |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.145
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 464
- सहायक विषय
- सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और सर्वत्र शोक देखना
- मुद्रित पृष्ठ
- 464, 465
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।