अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी] मङ्गल-मूॢतको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 447 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
स्रोत अभिलेख 2.125 · पुस्तक पृ. 447, 448
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
English explanation
Beholding the embodiment of auspiciousness with his own eyes, Valmiki felt immense joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बालमीकि | वाल्मीकि मुनि के | of the sage Valmiki |
| मन | मन में | in the heart |
| आनँदु | आनंद | joy |
| भारी | अत्यंत अधिक | immense |
| मंगल | मंगल, शुभता | auspiciousness |
| मूरति | साकार रूप | embodiment |
| नयन | आँखों से | with his eyes |
| निहारी | देखकर | having beheld |
2 तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
English explanation
Then Rama, lord of the Raghu line, joined his lotus-like hands and spoke words pleasing to the ears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| कर | हाथ | hands |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| जोरि | जोड़कर | joining |
| रघुराई | रघुकुल के स्वामी राम | Rama, lord of the Raghu line |
| बोले | बोले | spoke |
| बचन | वचन | words |
| श्रवन | कानों को | to the ears |
| सुखदाई | सुख देने वाले | giving pleasure |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.125
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 447
- सहायक विषय
- श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 447, 448
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।