अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
मूल पाठ
बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
स्रोत अभिलेख 2.276 · पुस्तक पृ. 573, 574
भावार्थ
मूल पाठ के बादवनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा)॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 574 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
English explanation
The poor forest-dwelling Kols and Kiratas grew exhausted at the sight; travelers too lost heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बनचर | वन में रहने वाले | forest dwellers |
| कोल | कोल समुदाय के लोग | people of the Kol community |
| किरात | किरात समुदाय के लोग | people of the Kirata community |
| बिचारे | बेचारे | poor; pitiable |
| थके | थक गए | grew exhausted |
| बिलोकि | देखकर | having seen |
| पथिक | यात्री; राहगीर | travelers |
| हियँ | हृदय में; मन से | at heart |
| हारे | हार गए; हिम्मत खो बैठे | lost courage |
2 आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
English explanation
When this river of grief reached and joined the ocean-like hermitage, it was as though that ocean surged up in distress.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आश्रम | आश्रम रूपी | the hermitage, figured as |
| उदधि | समुद्र | an ocean |
| मिली | मिल गई | joined |
| जब | जब | when |
| जाई | जाकर | having gone there |
| मनहुँ | मानो | as though |
| उठेउ | उमड़ उठा | surged up |
| अंबुधि | समुद्र | the ocean |
| अकुलाई | व्याकुल होकर | in distress |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.276
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 574
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 573, 574
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।