अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमाताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते (स्मरण करते) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पडऩे लगते हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 538 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.234 · पुस्तक पृ. 538, 539
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
English explanation
It was as though his mother’s wrongdoing turned him back; yet he moved onward, sustaining courage through the strength of devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| फेरत | पीछे लौटाती | turned him back |
| मनहुँ | मानो | as though |
| मातु | माता कैकेयी का | by his mother Kaikeyi |
| कृत | किया हुआ | committed |
| खोरी | अपराध; दोष | wrongdoing |
| चलत | आगे चलते | moved onward |
| भगति | भक्ति के | of devotion |
| बल | बल से | through the strength |
| धीरज | धैर्य | courage |
| धोरी | धारण करके | sustaining |
2 जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।
English explanation
Whenever he recalled Rama’s nature, his feet stepped eagerly along the path.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जब | जब | whenever |
| समुझत | याद करते; विचार करते | recalled |
| रघुनाथ | रघुकुल के स्वामी राम का | of Rama, lord of Raghu’s lineage |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
| तब | तब | then |
| पथ | मार्ग पर | on the path |
| परत | पड़ते | fell in steps |
| उताइल | उतावले; उत्सुक | eager |
| पाऊ | पाँव | feet |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.234
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 538
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 538, 539
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।