अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दशरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 616 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.326 · पुस्तक पृ. 616, 617
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
English explanation
AI-generated draft: Bharata’s body thrills with devotion; Sita and Rama dwell in his heart, his tongue chants the name, and his eyes hold tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुलक | रोमांच | thrill, with hairs standing on end |
| गात | शरीर | body |
| हियँ | हृदय में | in the heart |
| सिय | सीता | Sita, Rama’s wife |
| रघुबीरू | रघुवंश के वीर श्रीराम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| जीह | जीभ पर | on the tongue |
| नामु | प्रभु का नाम | the Lord’s name |
| जप | जप | chanting |
| लोचन | आँखों में | in the eyes |
| नीरू | आँसू | tears |
2 लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।
English explanation
Lakshmana, Rama, and Sita live in the forest; Bharata, while living at home, disciplines his body through austerity.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखन | लक्ष्मण, राम के भाई | Lakshmana, Rama’s brother |
| राम | श्रीराम | Rama |
| सिय | सीता | Sita |
| कानन | वन में | in the forest |
| बसहीं | रहते हैं | dwell |
| भरतु | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| भवन | भवन में | at home |
| बसि | रहकर | while residing |
| तप | तपस्या से | through austerity |
| तनु | शरीर को | the body |
| कसहीं | कठोर अनुशासन में साधते हैं | subject to rigorous discipline |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.326
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 616
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 616, 617
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।