अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[इस लालसाके पूर्ण हो जानेपर] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजीके मङ्गल और आनन्दके मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 347 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।
स्रोत अभिलेख 2.4 · पुस्तक पृ. 346, 347
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
English explanation
Then I shall have no concern whether my body lives on or passes away, so that no regret remains afterward.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| न | नहीं | no |
| सोच | चिंता | concern |
| तनु | शरीर | the body |
| रहउ | रहे | may remain alive |
| कि | या | or |
| जाऊ | चला जाए | may pass away |
| जेहिं | जिससे | so that |
| न | न | no |
| होइ | हो | may arise |
| पाछें | बाद में | afterward |
| पछिताऊ | पछतावा | regret |
2 सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।
English explanation
Sage Vasishtha heard Dasharatha's pleasing words; as a source of auspiciousness and joy, they delighted his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | hearing |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ | Sage Vasishtha |
| दसरथ | दशरथ के | Dasharatha's |
| बचन | वचन | words |
| सुहाए | सुंदर और प्रिय | pleasing |
| मंगल | मंगल का | of auspiciousness |
| मोद | आनंद का | of joy |
| मूल | मूल स्रोत | source |
| मन | मन को | to his heart |
| भाए | अच्छे लगे | were pleasing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 347
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 346, 347
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।