अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
मूल पाठ
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।
स्रोत अभिलेख 2.287 · पुस्तक पृ. 583, 584
भावार्थ
मूल पाठ के बादपिता जनकजीने तो स्नेहसे सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोचमें समा गयीं। पिता-माताने उन्हें फिर हृदयसे लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशिष दी॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 583 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
English explanation
Her father spoke truly in loving, gracious words; Sita seemed to be wholly absorbed in modest shyness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | पिता जनक | her father Janaka |
| कह | कहते हैं | says |
| सत्य | सत्य बात | the truth |
| सनेहँ | प्रेम से | with affection |
| सुबानी | सुंदर वाणी में | in gracious words |
| सीय | सीता | Sita |
| सकुच | संकोच | modest shyness |
| महुँ | में | in |
| मनहुँ | मानो | as though |
| समानी | समा गईं | became absorbed |
2 पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।
English explanation
Then her parents clasped Sita to their hearts and gave her gracious counsel and blessings for her welfare.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| पितु | पिता ने | her father |
| मातु | माता ने | her mother |
| लीन्ह | ले लिया | took her |
| उर | हृदय से | to their hearts |
| लाई | लगाकर | holding close |
| सिख | सीख | counsel |
| आसिष | आशीर्वाद | blessings |
| हित | हित के लिए | for her welfare |
| दीन्हि | दी | gave |
| सुहाई | सुंदर; मंगलकारी | gracious; beneficial |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.287
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 583
- सहायक विषय
- कौसल्या-सुनयना-संवाद, श्रीसीताजीका शील
- मुद्रित पृष्ठ
- 583, 584
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।