अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।
मूल पाठ
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।
स्रोत अभिलेख 2.77 · पुस्तक पृ. 407, 407
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगत्में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 407 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।
English explanation
Father, give me your blessing and permission. Why grieve at a time for joy?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | हे पिता | Father |
| असीस | आशीर्वाद | blessing |
| आयसु | आज्ञा | permission |
| मोहि | मुझे | to me |
| दीजै | दीजिए | please give |
| हरष | हर्ष का | of joy |
| समय | समय | time |
| बिसमउ | विषाद | distress |
| कत | क्यों | why |
| कीजै | कीजिए | should you experience |
2 तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।
English explanation
Father, acting unwisely out of love for a dear one causes one's fame in the world to fade and brings reproach.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | हे पिता | Father |
| किएँ | करने से | by doing |
| प्रिय | प्रियजन के | for a dear one |
| प्रेम | प्रेम में | out of love |
| प्रमादू | अविवेकपूर्ण चूक | an unwise lapse |
| जसु | यश | good reputation |
| जग | संसार में | in the world |
| जाइ | चला जाता है | is lost |
| होइ | होता है | arises |
| अपबादू | अपयश | reproach |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.77
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 407
- सहायक विषय
- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीका महाराज दशरथके पास विदा माँगने जाना, दशरथजीका सीताजीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 407, 407
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