अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 379 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।
स्रोत अभिलेख 2.43 · पुस्तक पृ. 379, 380
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
English explanation
I am devoted to you; reason with your father and say what will prevent disgrace to him in his old age.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितहि | पिता को | to your father |
| बुझाइ | समझाकर | having reasoned with |
| कहहु | कहो | say |
| बलि | मैं बलिहारी हूँ | I am devoted to you |
| सोई | वही बात | that very thing |
| चौथेंपन | बुढ़ापे में | in old age |
| जेहिं | जिससे | by which |
| अजसु | अपयश; बदनामी | disgrace; ill repute |
| न | न | not |
| होई | हो | come about |
2 तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।
English explanation
It is not right to slight the merit that has bestowed sons like you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम्हारे | you |
| सम | समान | like |
| सुअन | पुत्र | sons |
| सुकृत | पुण्य; अच्छे कर्मों का फल | merit from good deeds |
| जेहिं | जिसने | which has |
| दीन्हे | दिए हैं | bestowed |
| उचित | उचित | right; fitting |
| न | नहीं | not |
| तासु | उसका | of that merit |
| निरादरु | निरादर | disrespect; slighting |
| कीन्हे | करना | to do |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.43
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 379
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 379, 380
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