अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्रमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 553 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.251 · पुस्तक पृ. 552, 553
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
English explanation
Our nights and days pass in wrongdoing; we have no cloth around our waists, nor are our bellies filled.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पाप | पाप | wrongdoing |
| करत | करते हुए | while doing |
| निसि | रातें | nights |
| बासर | दिन | days |
| जाहीं | बीतते हैं | pass |
| नहिं | नहीं है | there is no |
| पट | कपड़ा | cloth |
| कटि | कमर पर | around the waist |
| नहि | नहीं | not |
| पेट | पेट | bellies |
| अघाहीं | भरते हैं | are filled |
2 सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।
English explanation
How could we ever have had a sense of righteousness, even in a dream? This is the effect of beholding Rama, the delight of Raghu’s lineage.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सपोनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| धरम | धर्म की | of righteousness |
| बुद्धि | समझ | understanding |
| कस | कैसे | how |
| काऊ | कभी | ever |
| यह | यह | this |
| रघुनंदन | रघुकुल के आनंदस्वरूप राम | Rama, delight of Raghu’s lineage |
| दरस | दर्शन का | of beholding |
| प्रभाऊ | प्रभाव | effect |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.251
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 553
- सहायक विषय
- वनवासियोंद्वारा भरतजीकी मण्डलीका सत्कार, कैकेयीका पश्चात्ताप
- मुद्रित पृष्ठ
- 552, 553
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।