अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
मूल पाठ
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।
स्रोत अभिलेख 2.21 · पुस्तक पृ. 360, 361
भावार्थ
मूल पाठ के बादमैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 360 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
English explanation
AI draft interpretation: I would rather go to my parental home and spend my whole life there, but I will never serve my co-wife while I live.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नैहर | मायके में | in my parental home |
| जनमु | जीवन; यहाँ सारी उम्र | life; here, my whole lifetime |
| भरब | बिता दूँगी | I will spend |
| बरु | भले ही; इससे तो अच्छा | rather; even if |
| जाइ | जाकर | having gone |
| जिअत | जीते-जी | while alive |
| न | नहीं | not |
| करबि | मैं करूँगी | I will do |
| सवति | सौत की | of my co-wife |
| सेवकाई | सेवा; दासता | service; servitude |
2 अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।
English explanation
For anyone whom fate keeps alive under an enemy’s control, death is better than such a life.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अरि | शत्रु के | of an enemy |
| बस | वश में; अधीन | under the control |
| दैउ | दैव; भाग्य | fate |
| जिआवत | जीवित रखता है | keeps alive |
| जाही | जिसे | whomever |
| मरनु | मरना | dying |
| नीक | अच्छा; बेहतर | better |
| तेहि | उस | that |
| जीवन | जीवन से | life |
| चाही | की अपेक्षा; से | than |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.21
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 360
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 360, 361
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।