अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।
मूल पाठ
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.79 · पुस्तक पृ. 408, 409
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे रघुवीर! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो। भीरु (प्रेमवश दुर्बल हृदयके) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें वन जानेको वे कभी न कहेंगे॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 409 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।
English explanation
O hero of Raghu’s lineage, you are as dear as life to the king. Under the pressure of his gentle nature and affection, he will not let you go.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नृपहि | राजा दशरथ को | to King Dasharatha |
| प्रान | प्राणों के समान | as life itself |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| तुम्ह | तुम | you |
| रघुबीरा | हे रघुवंश के वीर राम | O Rama, hero of Raghu’s lineage |
| सील | शील; सौम्य स्वभाव | gentle character |
| सनेह | स्नेह | affection |
| न | नहीं | not |
| छाड़िहि | छोड़ेंगे; जाने देंगे | will release; will let go |
| भीरा | दबाव; प्रबल वश | pressure; overpowering influence |
2 सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।
English explanation
Even if his merit, good name, and welfare in the next world are ruined, he will never tell you to go to the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुकृत | पुण्य; अच्छे कर्मों का फल | merit from good deeds |
| सुजसु | सुयश; अच्छी कीर्ति | good reputation |
| परलोकु | परलोक का कल्याण | welfare in the next world |
| नसाऊ | नष्ट हो जाए | may be ruined |
| तुम्हहि | तुम्हें | to you |
| जान | जाने के लिए | to go |
| बन | वन | the forest |
| कहिहि | कहेंगे | will say; will tell |
| न | नहीं | not |
| काऊ | कभी | ever |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.79
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 409
- सहायक विषय
- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीका महाराज दशरथके पास विदा माँगने जाना, दशरथजीका सीताजीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 408, 409
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।