अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दभरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [अथवा प्रेम] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता?॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 542 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।
स्रोत अभिलेख 2.238 · पुस्तक पृ. 541, 542
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।
English explanation
Seeing this, accomplished spiritual adepts and aspirants were moved with love and began praising Bharata's natural affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निरखि | देखकर | on seeing |
| सिद्ध | सिद्धि प्राप्त महात्मा | accomplished spiritual adepts |
| साधक | साधना करने वाले | spiritual aspirants |
| अनुरागे | प्रेम से भर गए | were moved with love |
| सहज | स्वाभाविक | natural |
| सनेहु | स्नेह | affection |
| सराहन | सराहने | to praise |
| लागे | लगे | began |
2 होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।
English explanation
If Bharata's love were not present on earth, who would make the immobile responsive and the mobile motionless?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होत | यदि होता | if there were |
| न | नहीं | not |
| भूतल | पृथ्वी पर | on earth |
| भाउ | प्रेमभाव | loving devotion |
| भरत | भरत | Bharata |
| को | का | belonging to |
| अचर | अचल या जड़ को | the immobile or insentient |
| सचर | सचल या चेतन | mobile or responsive |
| चर | चल या चेतन को | the mobile or sentient |
| अचर | अचल या स्तब्ध | motionless or transfixed |
| करत | बनाता | would make |
| को | कौन | who |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.238
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 542
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 541, 542
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।