अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दअसत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घँुघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं। 'सत्य ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों)-की जड़ है। यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 367 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।
स्रोत अभिलेख 2.28 · पुस्तक पृ. 366, 367
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।
English explanation
“No accumulation of sins equals falsehood. Can even millions of tiny gunja seeds equal a mountain?”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नहिं | नहीं है | there is no |
| असत्य | झूठ; असत्य | falsehood |
| सम | के बराबर | equal to |
| पातक | पापों का | of sins |
| पुंजा | समूह; ढेर | collection; heap |
| गिरि | पर्वत | a mountain |
| सम | के बराबर | equal to |
| होहिं | हो सकते हैं | can become; can be |
| कि | क्या | can?; whether |
| कोटिक | करोड़ों | tens of millions |
| गुंजा | गुंजा के छोटे बीज | tiny gunja seeds |
2 सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।
English explanation
“Truth is the foundation of all noble deeds; this is known from the Vedas and Puranas and has also been proclaimed by Manu.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सत्यमूल | सत्य को मूल माननेवाले | rooted in truth |
| सब | सभी | all |
| सुकृत | पुण्यकर्म | meritorious deeds |
| सुहाए | सुंदर; उत्तम | noble; excellent |
| बेद | वेदों में | in the Vedas |
| पुरान | पुराणों में | in the Puranas |
| बिदित | प्रसिद्ध; ज्ञात | known; established |
| मनु | मनु, धर्मविधि के प्राचीन प्रतिपादक | Manu, the ancient expounder of sacred law |
| गाए | गाया; वर्णन किया | sang of; proclaimed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.28
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 367
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 366, 367
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।