अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।
मूल पाठ
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।
स्रोत अभिलेख 2.28 · पुस्तक पृ. 366, 367
भावार्थ
मूल पाठ के बादमुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दोके बदले चार माँग लो। रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 367 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।
English explanation
“Do not blame me falsely, even in jest; ask for four boons instead of two, if you wish.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| झूठेहुँ | झूठ-मूठ भी | even falsely; even in jest |
| हमहि | मुझे | me |
| दोषु | दोष | blame |
| जनि | मत | do not |
| देहू | दो; लगाओ | give; lay upon |
| दुइ | दो वरदान | two boons |
| कै | के बदले | instead of |
| चारि | चार वरदान | four boons |
| मागि | माँगकर | having asked |
| मकु | चाहो तो; भले ही | if you wish; by all means |
| लेहू | ले लो | take |
2 रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।
English explanation
“The tradition of Raghu’s lineage has always been this: life may be lost, but one’s pledged word must not fail.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुकुल | राजा रघु का वंश | King Raghu’s lineage |
| रीति | परंपरा | tradition |
| सदा | सदैव | always |
| चलि | चलती | continuing |
| आई | आई है | has come down |
| प्रान | प्राण; जीवन | life |
| जाहुँ | चले जाएँ | may depart; may be lost |
| बरु | भले ही | even if |
| बचनु | दिया हुआ वचन | one’s pledged word |
| न | नहीं | not |
| जाई | जाए; टूटे | be lost; fail |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.28
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 367
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 366, 367
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।