अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
मूल पाठ
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.28 · पुस्तक पृ. 366, 367
भावार्थ
मूल पाठ के बादराजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 366 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
English explanation
The king laughs and says, “I understand the secret: you are very fond of sulking.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानेउँ | मैंने समझ लिया | I have understood |
| मरमु | भीतरी भेद | the underlying secret |
| राउ | राजा दशरथ | King Dasharatha |
| हँसि | हँसकर | laughing |
| कहई | कहते हैं | says |
| तुम्हहि | तुम्हें | to you |
| कोहाब | रूठना; क्रोध करना | sulking; becoming angry |
| परम | अत्यंत | extremely |
| प्रिय | प्रिय | dear; pleasing |
| अहई | है | is |
2 थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।
English explanation
“You left the boons in safekeeping and never asked for them; in my simple-heartedness, I forgot.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| थाति | धरोहर; सुरक्षित रखे वरदान | a deposit; the boons held in safekeeping |
| राखि | रखकर | having kept |
| न | नहीं | not |
| मागिहु | तुमने माँगे | you asked for them |
| काऊ | कभी | ever |
| बिसरि | भूल | forgotten |
| गयउ | गया | became; went |
| मोहि | मुझे; मुझसे | to me; by me |
| भोर | भोला; सरल | simple; guileless |
| सुभाऊ | स्वभाव | disposition |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.28
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 366
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 366, 367
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।