अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दु:ख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 516 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।
स्रोत अभिलेख 2.209 · पुस्तक पृ. 516, 517
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
English explanation
Dear son, your fame is like a pure new moon; Rama’s servants are like water lilies and chakor birds delighting in it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नव | नया | new |
| बिधु | चंद्रमा | moon |
| बिमल | निर्मल | pure |
| तात | हे तात, प्रिय पुत्र | dear son |
| जसु | यश | fame |
| तोरा | तुम्हारा | your |
| रघुबर | रघुकुलश्रेष्ठ राम के | of Rama, foremost of the Raghu lineage |
| किंकर | सेवक | servants |
| कुमुद | चाँदनी में खिलने वाले कुमुद | moon-blooming water lilies |
| चकोरा | चंद्रमा से अनुराग रखने वाले चकोर पक्षी | chakor birds that love the moon |
2 उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।
English explanation
This moon of fame will remain ever risen and never set; in the sky of the world it will never wane, but grow twofold day by day.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उदित | उगा हुआ | risen |
| सदा | सदैव | always |
| अँथइहि | अस्त होगा | will set |
| कबहूँ | कभी भी | ever |
| ना | नहीं | not |
| घटिहि | घटेगा | will wane |
| न | नहीं | not |
| जग | जगत रूपी | the world as |
| नभ | आकाश में | in the sky |
| दिन | दिन | day |
| दिन | दिन; प्रतिदिन | by day |
| दूना | दुगुना बढ़ता हुआ | growing twofold |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.209
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 516
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 516, 517
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।