अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दत्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा। कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 517 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।
निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।
स्रोत अभिलेख 2.209 · पुस्तक पृ. 516, 517
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।
English explanation
The three worlds, likened to chakravak birds, will greatly love it; even the sun of the Lord’s majesty will not diminish its beauty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोक | चक्रवाक पक्षी के समान | likened to chakravak birds |
| तिलोक | तीनों लोक | the three worlds |
| प्रीति | प्रेम | love |
| अति | बहुत | greatly |
| करिही | करेंगे | will show |
| प्रभु | प्रभु राम का | of Lord Rama |
| प्रताप | तेज और महिमा | majesty and radiance |
| रबि | सूर्य | sun |
| छबिहि | इसकी शोभा को | its beauty |
| न | नहीं | not |
| हरिही | हर लेगा | will take away |
2 निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।
English explanation
It will always bring happiness to everyone, night and day; the Rahu of Kaikeyi’s deed will not eclipse it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निसि | रात | night |
| दिन | दिन | day |
| सुखद | सुख देने वाला | bringing happiness |
| सदा | सदा | always |
| सब | सभी | all |
| काहू | लोगों को | to people |
| ग्रसिहि | ग्रस लेगा | will swallow or eclipse |
| न | नहीं | not |
| कैकइ | कैकेयी का | of Kaikeyi, Dasharatha’s queen |
| करतबु | कृत्य | deed |
| राहू | ग्रहण लगाने वाला राहु | Rahu, the eclipsing celestial figure |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.209
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 517
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 516, 517
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।