अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दआँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 459 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।
स्रोत अभिलेख 2.139 · पुस्तक पृ. 459, 459
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
English explanation
AI draft: Creatures with eyes behold Rama, obtain the fruit of their birth, and become free from sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नयनवंत | नेत्र वाले जीव | creatures with eyes |
| रघुबरहि | रघुकुलश्रेष्ठ राम को | Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| बिलोकी | देखकर | having beheld |
| पाइ | पाकर | having obtained |
| जनम | जन्म का | of birth |
| फल | फल; सार्थकता | fruit; fulfillment |
| होहिं | हो जाते हैं | become |
| बिसोकी | शोकरहित | free from sorrow |
2 परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।
English explanation
Touched by the dust of his feet, even immobile beings became happy and eligible for the supreme spiritual state.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परसि | स्पर्श करके | having touched |
| चरन | चरणों की | of the feet |
| रज | धूल | dust |
| अचर | अचल जीव, जैसे वृक्ष | immobile beings, such as trees |
| सुखारी | सुखी | happy |
| भए | हो गए | became |
| परम | सर्वोच्च | supreme |
| पद | आध्यात्मिक अवस्था | spiritual state |
| के | के | of; for |
| अधिकारी | पात्र | eligible recipients |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.139
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 459
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 459, 459
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।