अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।
मूल पाठ
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।
स्रोत अभिलेख 2.206 · पुस्तक पृ. 514, 515
भावार्थ
मूल पाठ के बादउन्होंने दौड़कर भरतजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनिने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोचके घरमें घुस जाना चाहते हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 514 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।
English explanation
The sage hurried forward, raised Bharata, embraced him, and blessed him, making him feel fulfilled.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धाइ | दौड़कर | hurrying forward |
| उठाइ | उठाकर | raising him |
| लाइ | लगाकर | drawing close |
| उर | हृदय से | to his chest |
| लीन्हे | ले लिया | took him |
| दीन्हि | दी | gave |
| असीस | आशीर्वाद | a blessing |
| कृतारथ | कृतार्थ, धन्य | fulfilled, blessed |
| कीन्हे | किया | made him |
2 आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।
English explanation
The sage offered a seat; Bharata bowed his head and sat down. He seemed to wish to flee into the house of diffidence and hide there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आसनु | बैठने का स्थान | a seat |
| दीन्ह | दिया | offered |
| नाइ | झुकाकर | bowing |
| सिरु | सिर | his head |
| बैठे | बैठ गए | sat down |
| चहत | चाहते थे | wished |
| सकुच | संकोच के | of diffidence |
| गृहँ | घर में | into the house |
| जनु | मानो | as though |
| भजि | भागकर | fleeing |
| पैठे | प्रवेश कर जाएँ | enter and hide |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.206
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 514
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 514, 515
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।