अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दधीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गद्गद वचन कहने लगीं—हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 389 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।
स्रोत अभिलेख 2.54 · पुस्तक पृ. 388, 389
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।
English explanation
Gathering courage and looking at her son’s face, the mother speaks in a voice choked with emotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धरि | धारण करके; सँभालकर | gathering; holding |
| धीरजु | धैर्य | composure |
| सुत | पुत्र का | her son’s |
| बदनु | मुख | face |
| निहारी | देखकर | having looked at |
| गदगद | भावावेश से रुंधे हुए | choked with emotion |
| बचन | वचन | words |
| कहति | कहती हैं | speaks |
| महतारी | माता कौसल्या | mother Kaushalya |
2 तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।
English explanation
Son, you are as dear to your father as his own life; he rejoices daily in seeing your conduct.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | बेटा | dear son |
| पितहि | पिता को | to your father |
| तुम्ह | तुम | you |
| प्रानपिआरे | प्राणों के समान प्रिय | dear as life itself |
| देखि | देखकर | on seeing |
| मुदित | प्रसन्न होते हैं | rejoices |
| नित | प्रतिदिन; सदा | daily; always |
| चरित | आचरण; कार्य | conduct; deeds |
| तुम्हारे | तुम्हारे | your |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.54
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 389
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 388, 389
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।