अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।
मूल पाठ
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।
स्रोत अभिलेख 2.269 · पुस्तक पृ. 567, 568
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 568 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।
English explanation
The Lord has entrusted the entire responsibility to me, but I lack discernment concerning both right conduct and duty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देवँ | प्रभु ने | the Lord has |
| दीन्ह | दिया | given |
| सबु | सारा | all |
| मोहि | मुझे | to me |
| अभारु | दायित्व; भार | responsibility; charge |
| मोरें | मुझमें | in me |
| नीति | नीति का ज्ञान | discernment of right conduct |
| न | नहीं | not |
| धरम | धर्म का | of duty |
| बिचारु | विचार; विवेक | consideration; discernment |
2 कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।
English explanation
I say all these things for my own interest; a distressed person’s mind retains no clear judgment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I say |
| बचन | बातें | words |
| सब | सब | all |
| स्वारथ | अपने हित के | of my own interest |
| हेतू | लिए | for the sake |
| रहत | रहता | remains |
| न | नहीं | not |
| आरत | व्याकुल व्यक्ति | a distressed person |
| कें | के | of |
| चित | चित्त में | in the mind |
| चेतू | विवेक; सुध-बुध | discernment; clear awareness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.269
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 568
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 567, 568
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।