अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।
मूल पाठ
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।
स्रोत अभिलेख 2.269 · पुस्तक पृ. 567, 568
भावार्थ
मूल पाठ के बादस्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी (आप) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं!॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 568 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।
English explanation
Even shame itself feels ashamed on seeing a servant who answers back after hearing his master’s wish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उतरु | प्रत्युत्तर | a reply in opposition |
| देइ | देता है | gives |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| स्वामि | स्वामी की | the master’s |
| रजाई | इच्छा; आज्ञा | wish; command |
| सो | उस | that |
| सेवकु | सेवक को | servant |
| लखि | देखकर | on seeing |
| लाज | लज्जा भी | even shame |
| लजाई | लजा जाती है | becomes ashamed |
2 अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।
English explanation
I am such a fathomless ocean of faults, yet my master, out of affection, praises me as virtuous.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | such |
| मैं | मैं | I |
| अवगुन | दोषों का | of faults |
| उदधि | समुद्र | an ocean |
| अगाधू | अथाह | fathomless |
| स्वामि | स्वामी | my master |
| सनेहँ | स्नेह के कारण | out of affection |
| सराहत | सराहते हैं | praises |
| साधू | साधु; सज्जन कहकर | as virtuous; as a good person |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.269
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 568
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 567, 568
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।