अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।
मूल पाठ
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।
स्रोत अभिलेख 2.17 · पुस्तक पृ. 357, 358
भावार्थ
मूल पाठ के बादतुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरहसे गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़साती (शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशारूपी मन्थरा) बोली—॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 357 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।
English explanation
Manthara says: You ask, but I am afraid to speak; you have named me a home-wrecker.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आप | you |
| पूँछहु | पूछती हैं | ask |
| मैं | मैं | I |
| कहत | कहने में | in speaking |
| डेराऊँ | डरती हूँ | am afraid |
| धरेउ | रख दिया है | have given |
| मोर | मेरा | my |
| घरफोरी | घर में फूट डालने वाली | one who breaks up a household |
| नाऊँ | नाम | name |
2 सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।
English explanation
Having secured confidence and fashioned her story in many ways, Manthara—likened to a period of Saturnine misfortune for Ayodhya—then spoke. The reading “छोली” is uncertain here.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सजि | जमाकर | having established |
| प्रतीति | विश्वास | confidence |
| बहुबिधि | अनेक प्रकार से | in many ways |
| गढ़ि | गढ़कर | having fabricated |
| छोली | छलपूर्ण बातें; गढ़े हुए कपटपूर्ण तर्क। | Deceptive claims or fabricated, manipulative arguments. |
| अवध | अयोध्या की | of Ayodhya |
| साढ़साती | साढ़ेसाती जैसी विपत्ति, मंथरा | Manthara, a Saturnine scourge |
| तब | तब | then |
| बोली | बोली | spoke |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.17
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 357
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 357, 358
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।