अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
मूल पाठ
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।
स्रोत अभिलेख 2.96 · पुस्तक पृ. 422, 423
भावार्थ
मूल पाठ के बादआप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दु:ख न पावें॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 422 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
English explanation
You too are a great well-wisher of mine, like a father. Dear sir, I make this request with folded hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आप | you |
| पुनि | भी; फिर | also; moreover |
| पितु | पिता | a father |
| सम | के समान | like |
| अति | बहुत | very much |
| हित | हितैषी | a well-wisher |
| मोरें | मेरे | of mine |
| बिनती | विनती | a request |
| करउँ | मैं करता हूँ | I make |
| तात | हे तात; आदरणीय जन | dear sir; respected elder |
| कर | हाथ | hands |
| जोरें | जोड़कर | having folded |
2 सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।
English explanation
In every way, you should do whatever keeps Father from suffering through worry about us.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | हर; सभी | every; all |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| सोइ | वही | that very thing |
| करतब्य | करने योग्य कार्य | what ought to be done |
| तुम्हारें | आपके द्वारा | by you |
| दुख | दुख | distress |
| न | न | not |
| पाव | पाएँ | may suffer |
| पितु | पिता दशरथ | Father Dasharatha |
| सोच | चिंता से | through worry |
| हमारें | हमारे लिए | about us |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.96
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 422
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 422, 423
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।