अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।
मूल पाठ
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।
स्रोत अभिलेख 2.177 · पुस्तक पृ. 490, 491
भावार्थ
मूल पाठ के बादआप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 490 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।
English explanation
You indeed give only sincere advice which, when followed, would benefit me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आप | you |
| तौ | तो; निश्चय ही | indeed |
| देहु | देते हैं | give |
| सरल | निष्कपट | sincere; guileless |
| सिख | सीख | advice |
| सोई | वही | that very |
| जो | जिसके अनुसार | according to which |
| आचरत | आचरण करने पर | when acted upon |
| मोर | मेरा | my |
| भल | भला | benefit; welfare |
| होई | हो | would result |
2 जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।
English explanation
Although I understand this well, my heart still finds no satisfaction.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जद्यपि | यद्यपि | although |
| यह | यह | this |
| समुझत | समझता | understand |
| हउँ | मैं हूँ | I am |
| नीकें | अच्छी तरह | well |
| तदपि | फिर भी | nevertheless |
| होत | होता | arises |
| परितोषु | संतोष | satisfaction |
| न | नहीं | not |
| जी | मन | heart; mind |
| कें | में; को | in; to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.177
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 490
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 490, 491
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।